क्षणिकाएँ
- बरसात
हमारे यहाँ तो
बारहों महीने
रहती है बरसात
घर में बीवी
और
दफ्तर में साहब
बरसते हैं दिन-रात
--000--
- यादें
तुम्हारी यादें
सुरक्षित हैं
गैस कांड की तरह
और तुम
गायब हो
मुआवजे की तरह
--000--
- डैड
सभ्यता में
आजकल लोग
कैसे हो गए
जिंदा पिता भी
अब
डैड हो गए
--000-- - केक्टस सभ्यता
कैसे कैसे
चलन हो गए
कैसी हो गई
नेक चलनी
भूल गए तुलसी गुलाब
लगाते हैं लोग
नागफनी
--000--
:: डॉ॰ शरद जैन ::

0 Comments:
Post a Comment
<< Home